On Thursday 12th February 2026 at 02:45 PM Regarding Strikes Details Hindustan Screen//हिंदुस्तान स्क्रीन
हड़ताल क्यूं बन जाती है मज़दूरों की मजबूरी?
12 फरवरी 2026 की हड़ताल को कवर करना एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी थी। ध्यान रखने वाली बात थी इस कवरेज के दौरान इसकी निष्पक्षता को कायम रखना। सत्ता समर्थक लोगों और विपक्ष समर्थक लोगों की बातों में से सच का पता लगाना। क्यूंकि हड़ताल ख़ुशी से नहीं की जाती। इसे तभी किया जाता है जब इसके बिना कोई और रास्ता न बचे। जब हड़ताल एक मजबूरी बन जाए। इस बार 12 फरवरी की देशव्यापी हड़ताल की कवरेज पर निकलने से पहले मन में एक सवाल उठा कि भारत में सत्ता के खिलाफ वाम समर्थक और अन्य विपक्षी दलों केसमर्थक अब तक कितनी हड़तालें कर चुके होंगें? देश भर में हड़तालों का इतिहास क्या है?
दुनिया के साथ साथ भारत में हड़तालों का इतिहास क्या है? हड़ताल का कदम लोकतांत्रिक असहमति, श्रमिक अधिकारों और राजनीतिक संघर्षों से गहराई से जुड़ा हुआ होता है। यह केवल मजदूर आंदोलनों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई बार सत्ता के खिलाफ व्यापक राजनीतिक प्रतिरोध का रूप भी ले चुका है — जिसमें वामपंथी दलों, ट्रेड यूनियनों और अन्य विपक्षी दलों की प्रमुख भूमिका रही है। हड़ताल के ज़रिए संघर्ष का एक लम्बा इतिहास है। इस इतिहास को देखते हुए कई नए सवाल भी मन में उठते ही हैं। आओ देखते हैं एक नज़र हड़तालों के सिलसिले पर। नीचे इसका कालखंडवार संक्षिप्त लेकिन सारगर्भित इतिहास प्रस्तुत है:
इसे याद रखना अच्छा रहेगा कि औपनिवेशिक काल (ब्रिटिश शासन) — श्रमिक चेतना की शुरुआत इस अतीत का एक विशेष हिस्सा है। सन 1877–1890 के दशक लोगों ने हड़ताल का बहुत ही यादगारी रूप देखा। मज़दूरों के शक्ति ने दुनिया को बंबई की कपड़ा मिलों और रेलवे कर्मियों की शुरुआती हड़तालें मज़दूर जमात का एक ऐसा कदम था जिस ने मज़दूरों की शक्ति को सभी के सामने रखा। यह एक शक्ति प्रदर्शन भी था।
इसी तरह सन 1920 में जब ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना हुई और लाला लाजपत राय इसके पहले अध्यक्ष बने। बाद में यही एटक वामपंथी प्रभाव में आई।
वर्ष 1928 में बॉम्बे टेक्सटाइल हड़ताल भी बढ़ा कदम था। कम्युनिस्ट नेतृत्व में 1.5 लाख से अधिक मजदूरों की ऐतिहासिक हड़ताल को आज भी जोशो खरोश के साथ याद किया जाता है।
इसके बाद 1946 में नौसेना विद्रोह ने नया इतिहास रचा। यह ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ एक सशस्त्र विद्रोह था जिसमें मजदूर संगठनों ने समर्थन दिया। इसकी चर्चा आज भो अक्सर होती है।
गौरतलब है कि इस दौर में हड़तालें राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़ गईं। इस तरह समय के साथ साथ हड़ताल नए रंग रूप बदलती और अपनाती भी रही।
जब देश आज़ाद हुआ तो स्वतंत्रता के बाद अर्थात 1950–1960 का दशक भी बेहद ख़ास रहा। संगठित मजदूर शक्ति इस अवसर पर समाज और सत्ता के लिए लिए बहुत बड़ी चुनौती बन कर उभरी। मज़दूरों की इस संगठित शक्तिं शामिल थे वामपंथी दलों के नेता और वर्कर शामिल रहे जिनमें CPI, बाद में CPI(M भी और कांग्रेस फिर समर्थित यूनियनों जैसे कि INTUC) के बीच प्रतिस्पर्धा ने भी ज़ोर पकड़ा।
हड़तालों की इस सफलता से सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों में मज़दूर आंदोलन भी मज़बूत हुए। हड़तालें मज़दूरों के लिए बहुत बड़ा हथियार बन के संसार के सामने आईं।
यह नारा बहुत लोकप्रिय होने लगा कि:
हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है!
इसके बाद हड़ताल का दायरा और बढ़ा। मज़दूरों के संगठन भी और अधिक विशाल हुए। वर्ष 1960 और 1968 की देशव्यापी हड़तालें बहुत असरदायिक रहीं। इन हड़तालों का मकसद था वेतन, महंगाई भत्ता और श्रम अधिकारों के लिए सम्मान जनक उजरत हासिल करना।
इसी रफ़्तार के चलते वर्ष 1974 में हुई रेलवे हड़ताल भी विशेष रही। यह सबसे बड़ी औद्योगिक हड़ताल जिसके नेता थे जॉर्ज फर्नांडिस। वह समाजवादी नेता थे। इस हड़ताल में भागीदारी भी बहुत बड़ी थी। उस समय में भी लगभग 17 लाख रेल कर्मचारी इस हड़ताल में शामिल रहे।
इस हड़ताल में भी मुख्य मुद्दा था वेतन और कार्य स्थितियां। कामकाज के हालात बहुत पहले से ही सुधर की मांग करते आ रहे हैं। इसका हड़ताल का परिणाम भी बहुत गंभीर रहा ,सत्ता ने हड़तालियों को डराने की बहुत कोशिश की। सरकार ने कड़ा दमन किया; हजारों गिरफ्तारियाँ।वास्तव में यह हड़ताल इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ जन असंतोष का प्रतीक बनी और आपातकाल (1975) से पहले की राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार की।
फिर आया आपातकाल और इसका समय था 1975–77 जिसे आज भी याद किया जाता है। इसी दौर में जब सख्तियां तेज़ होना शुरू हुई तो हड़तालें और अन्य विरोध प्रतिबंधित क्र दिए गए।
इस दमन के चलते ट्रेड यूनियन गतिविधियाँ बहुत ही सीमित हो कर रह गईं। विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी न्र इस संघर्ष को और भी दिलचस्प बना दिया। इस सरे दौर ने भी एक नया इतिहास रचा।
इसके बाद आया वर्ष 1980 से 1990 तक का दशक , यह दौर उदारीकरण से पहले और बाद में भी देखा गया। वर्ष 1982 की बॉम्बे टेक्सटाइल हड़ताल (दत्ता सामंत के नेतृत्व में) में चली थी बहुत लंबी भी चली लेकिन अंततः असफल। इस असफलता से भी ट्रेडयूनियन नेताओं ने बहुत से सबक सीखे।
इन संघर्षों और हड़तालों के चलते आया वर्ष 1991 जब उदारीकरण का दौर शुरू हो गया था। आर्थिक उदारीकरण के बाद एक नई आर्थिकता ने जन्म लिया जो अभी तक जारी है।
इसी उदारीकरण और निजीकरण ने एक नए रोष और आक्रोश को भी जन्म दिया। श्रम सुधारों के खिलाफ वाम दलों की देशव्यापी हड़तालें भी हुईं। इन हड़तालों ने भी इतिहास रचा। इसी से "भारत बंद" की अवधारणा व्यापक हुई।
वर्ष 2000 के बाद हड़ताल का एक नया संगठियत रूप भी सामने आया। संयुक्त ट्रेड यूनियन हड़तालें भी सामने आने लगी। वर्ष 2000 के दशक से लगभग हर 2–3 वर्ष में केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ संयुक्त हड़तालें हुईं।
इन वर्षों 2010, 2012, 2016, 2019, 2020, 2022 में हुई हड़तालों ने भी कमाल कर दिखाए। मज़दूरों की एकजुट शक्ति सरमाएदार और सम्रज्य्वादियों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन कर सामने आई।
इन हड़तालों में प्रमुख मुद्दे थे श्रम कानूनों में बदलाव को वॉइस लेने की मांग। इस और कुछ दुसरे मुद्दे भी। इन मुद्दों के साथ ही निजीकरण और महंगाई के विकराल रूप का मुद्दा भी उठा।
इसी दौर में किसान आंदोलन भी हुआ। वर्ष 2020–21 के इस किसान आंदोलन ने पूरी दुनिया के सामने किसानों और मज़दूरों की एकजुट और बेहद अनुशास्ति शक्ति का लोहा भी मनवाया।
इनमें CPI, CPI(M), AITUC, CITU, HMS आदि यूनियनों के साथ कई गैर-वाम दलों ने भी समर्थन दिया। इस तरह हड़ताल का असर और शक्ति भी बढ़ती चली गई।
उल्लेखनीय है कि किसान आंदोलन और संयुक्त प्रतिरोध (2020–21) तीन कृषि कानूनों के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन था। हड़तालों का इतिहास देखें तो कई बार "भारत बंद" का आह्वान भी हुआ और कई बार पूरी तरह से सफल भी रहा। विपक्षी दलों और ट्रेड यूनियनों का समर्थन और आपसी संबंध भी गहराता चला गया।
लेकिन इसके राजनीतिक परिप्रेक्ष्य पर भी चर्चा हो सकती है। इसका भी बहुत महत्व है।
ज्ञात रहे कि भारत में हड़तालें तीन स्तरों पर होती रही हैं।
एक तो श्रमिक हड़तालें जिनमें वेतन, श्रम और अन्य अधिकार लेने की मनिगन भी आ जाती हैं।
दूसरा है राजनीतिक हड़तालें जिनमें सत्ता की नीतियों के विरोध में आवाज़ बुलंद की जाती है।
प्रतीकात्मक बंद/भारत बंद – विपक्ष द्वारा सत्ता के खिलाफ दबाव।
वाम दलों की भूमिका ऐतिहासिक रूप से प्रमुख रही है, लेकिन समाजवादी, क्षेत्रीय और कभी-कभी दक्षिणपंथी दलों ने भी सत्ता में न होने पर हड़तालों का सहारा लिया है।
इस तरह इस विषय पर आलोचना और बहस भी हो सकती है। hडाल की बात करते हुए समर्थकों का बहुत ही स्पष्ट तर्क है कि यह लोकतंत्र में जन-असहमति का वैध माध्यम है।
दूसरी तरफ आलोचकों का तर्क भी ज़बरदस्त है। इससे आम जनता और अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।
हम जल्द ही इसी विषय पर कुछ और चर्चा भी करेंगे।
नोट: Generetd By AI and Edited Media Link Desk










